जब पुराने सफ़र की बातें याद आती हैं तो कितना अच्छा लगता है! अकसर ये सफ़र मां के साथ, पूरे परिवार के साथ किए जाते थे ... कैसे ट्रेन छूटने से पहले ही जा कर स्टेशन पर बैठ जाना...हमारा सारा ध्यान पूरी-छोले खाने पर, लोटपोट और चंदामामा खरीदने पर और एक छोटा सा स्कूटर हथिया लेने पर ही रहता ... अगर अमृतसर से अंबाला जा रहे हैं तो फ़क़त एक रेक्सीन की या चमड़े की अटैची होती जिस की हिफ़ाज़त के लिए उस पर मोटे कपड़े का कवर चढ़वा लिया जाता...
हिफ़ाज़त से बात याद आई ...आज से ४०-५० साल पहले वाला दौर वह था जब बस इसी तरह की हिफ़ाज़त ही दरकार की ...सामान की ...उस अटैची में पड़े ज़ेवरात की ...जिन्हें भी अकसर किसी शादी-ब्याह में जाते वक्त साथ ही लेकर चला जाता था...लेकिन बच्चों की हिफ़ाज़त कोई इतना मुद्दा नहीं था...क्योंकि आपसी भरोसा कायम था ...मुझे धुंधली याद है कि जब लुधियाना स्टेशन आता, मुझे प्यास लगती ...तो मां देखती अगर कोई आदमी डिब्बे से बाहर निकल रहा है तो उसे पुकार कर कहती ..भाई साहब, ज़रा इसे भी पानी पिला देना।
हम यह सुनते ही उस अनजान आदमी के साथ हो लेते ...वह प्लेटफार्म पर लगी टूटी पर हमें ले जाता ...अपनी हथेली को चुल्लू की शक्ल देकर हमें दो-चार चुल्लू पानी पिला देता...हम तृप्त हो कर मां के पास लौट आते ...इतना भरोसा अनजान लोगों पर ...यह कोई बड़ी बात नहीं था उस दौर में ...यह हर तरफ़ दिखाई देता था ... बच्चे को ऐसे ही किसी के साथ पानी पिलाने को भेज देना ..और इतना सीधापन की अगर ख़ुद भी कहीं दो मिनट नीचे उतरने की नौबत आन पहुंची है तो पास बैठे किसी अनजान को यह कह कर नीचे उतर जाना - भाई, ज़रा यह मेरी अटैची का ख़्याल रखना ...मैं बस पांच मिनट में आई। यही नहीं, अमृतसर स्टेशन से गाड़ी चलते ही दूसरे दर्जे के डिब्बे में सब लोगों ने अपनी अपनी रोटी की पोटली निकाल लेनी....और महिलाएं तो ऐसे आपस में घुल-मिल जातीं जैसे पुरानी दोस्त हों...किसी का आम का आचार, किसी की आलू की सब्जी, पकौड़े, किसी की आलू-मेथी, भुजिया ....ऐसा नज़ारा बन जाता सच में जैसे पूल-लंच (यह लफ्ज़ हमने बाद में सुना ..) चल रहा हो ....लेकिन हम बड़े होने पर मां से यह शिकायत ज़रूर करते कि बीजी, यह कैसे ..आप कैसे अनजान लोगों के साथ हमें गाड़ी के बाहर पानी पीने के लिए भिजवा देती थीं....मां एक दम सीधी-सपाट ...हंस कर बात को उसी वक्त रफ़ा-दफ़ा कर देती।
दो तीन यादें तो बचपन के सफ़र की हमारी यादों में खुद चुकी हैं, चलिए इन को आप से साझा करते हैं... हम बिल्कुल छोटे से ...मां के साथ अमृतसर से अंबाला जा रहे थे ..दूसरे दर्जे का डिब्बा था ...उन दिनों थर्ड-क्लास का डिब्बा नया नया ही बंद हुआ था ..(अब सोच कर भी हंसी आती है ....उस एक समझदार ने देशवासियों को केटल-क्लास कहा तो कितना बवाल उठा था...लेकिन पहले थर्ड-क्लास का डिब्बा भी हुआ करता था ...यह पोस्ट पढ़ने वाले कुछ लोगों को तो यह पता भी न होगा शायद। हां, तो बात एक सफ़र की कर रहा था ...तो हुआ यूं कि खिड़की वाली सीट पर बैठे इंसान की एक अंगुली कट गई थी..लहू-लुहान हो गया था ....उसने हाथ खिड़की पर रखा हुआ था और उस के हाथ के ऊपर वह भारी भरकम खिड़की गिर पड़ी थी ...हमें बहुत बुरा लगा था ...हमें क्या, सारे डिब्बे में जैेसे कोहराम मच गया था ... बहुत अपनापन हुआ करता था ...उस की अंगुली कट गई थी या पूरी तरह से दब गई थी ...हमें कुछ याद नहीं ...लेकिन उस का ख़ून बहुत बहा था....
इस हादसे की वजह से यह हुआ कि आज तक जब भी गाड़ी के दूसरे डिब्बे में या स्लीपर क्लास में सफ़र करते हैं ....खिड़की को ऊपर चढ़ा कर उस का लॉकिंग सिस्टम अच्छे से देख लेते हैं ...क्योंकि वह घटना याद आ जाती है ...बहुत से लोगों को वह सुनाई भी है ..अच्छा, एक बात है पहले खिड़की के शीशे बहुत ही भारी भरकम किस्म के हुआ करते थे ...और उसी तरह से लोहे वाली खिड़की भी बहुत भारी और उस से भी भारी उस के आसपास वाला फ्रेम ....मुझे परसों भी यह घटना उस वक्त याद आई जब सुबह मैं एक ट्रेन में कल्याण से चढ़ा ...यह ट्रेन मनमाड़ से मुंबई वी.टी जा रही थी ...मैंने देखा कि गाड़ी में खिड़की बहुत ही खूबसूरत थीं....और सब से ख़ुशग़वार बात यह थी कि इन्हें ऊपर-नीचे करने का कुछ झंझट ही नहीं था...क्योंकि इन स्लाईड कर के आप मर्ज़ी से इधर उधर कर सकते हैं ...मुझे बहुत अच्छा लगा और मन ही मन मैंने रेलवे के इंजीनियर्ज़ की बहुत तारीफ़ की जो दिन-प्रतिदिन सुविधाएं बेहतर करने की सोचते रहते हैं ...बेशक, रेलवे यह सब करती है ....वह बात दूसरी है कि हमारी जनसंख्या ही इतनी है कि रेलवे भी क्या करे...जितना हो सकता है, उस से भी ज़्यादा कर रही है निरंतर। हां, उस वक्त गाड़ी खाली थी ...मैंने उन खिड़कियों की खूब तस्वीरें खींचीं...शायद एक दो बार मैं पहले भी ऐसी स्लाईडिंग खिड़कियां रेल के सवारी डिब्बों में देख चुका हूं ..लेकिन अच्छे से याद नहीं कहां और कब। इसलिए इस ताज़ी बात को अपनी यादों की गठरी में सहेज लेने का ख़्याल आ गया।
और एक बात बहुत अच्छी लगी ... इस दूसरे दर्जे के डिब्बे में सीटों के नीचे पानी की बोतल रखने के स्टैंड भी बने हुए थे...जब हम बचपन में सफ़र करते थे तो उन दिनों अगर सफ़र लंबा होता और रात बीच में पड़ती तो फर्स्ट के डिब्बे के बाहर, खिड़की के साथ हमारे पिता जी एक मश्क सी बांध देते .....उस में पानी एक दम ठंड़ा हो जाता ... वरना, सुराही तो लेकर ही चलते थे ..और हां, कभी कभी एक फ्लास्क भी साथ में होती थी जो वैसे तो एल्यूमीनियम की होती थी लेकिन उस के बाहर एक फेल्ट नुमा कवर लगा होता था ...उतनी मज़बूत फ्लास्क मैंने कभी नहीं देखी आज तक ...
फिर वह वक्त भी आ गया जब हमारी सीधी-सादी ज़िंदगी में इस प्लास्टिक ने जैसे आग ही लगा दी ..सच में आग ही लगा दी है इसने ...हर तरफ़ इस के इस्तेमाल से हम ने वातावरण को कितना नुकसान पहुंचाया है, यह बात जग-ज़ाहिर है अब ....हां, तो यह १९७७ मई के आसपास की बात है ...हम लोगों ने बंबई सेंट्रल से अमृतसर के लिए डीलक्स ट्रेन पकड़नी थी ...हम बैठ गए...इतने में मेरा बड़ा भाई जो हमें स्टेशन पर छोड़ने आया था ...एक प्लास्टिक की पानी की बोतल ले आया .....मेरे पूछने पर उसने बताया कि उस का दाम सात-आठ रूपये था ...उस की क्षमता यही डेढ़-दो लिटर रही होगी...लेकिन उसे देखते ही हम लोग इतने हैरान हुए थे, मुझे अच्छे से याद है ...एक अजीब तरह का गर्व महसूस किया था उस वक्त तो ...क्योंकि वह बोतल हमारे आस पास किसी के पास नहीं थी....लोग भी उसे देख रहे थे .....लेकिन वह गर्व दो घंटे बाद ही अफ़सोस में बदल गया ...जब उसमें रखा पानी उबलने लगा और हम उसे ही पीने के लिए मजबूर थे ...खैर, उस के बाद तो जैसे प्लास्टिक का तूफ़ान ही आ गया दुनिया में ...हर चीज़ प्लास्टिक की ...जहां तक आप की कल्पना जा सकती है, वह चीज़ प्लास्टिक में उपलब्ध होने लगी। इस का अंजाम हम देख ही रहे हैं...।
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| बीजी, आज यादों की गठरी समेटते हुए आप का भी खूब ज़िक़्र चला ...कल रात आप सपने में भी थीं...शुक्रिया... |
बहुत हो गई ये यादें-वादें ....ये न ख़त्म होने की .... बंद करता हूं अब इस पिटारे को ..लेकिन वह बात तो मुझे यहां दर्ज करनी ही होगी कि किस तरह से स्टीम इंजन में सफ़र करते वक्त, खिड़की के पास बैठ कर ..अपना हाथ संभालते संभालते और खिड़की से बाहर देखने की ज़िद करते करते चार पांच घंटे के सफ़र के दौरान कैसे हम लोगों का सिर और मुंह काला हो जाया करता था ....नानी के यहां जाते ही हैंड-पंप से पानी निकाल कर नहाना लाज़िम होता था और हां सफ़र के दौरान बार बार आंख में कोयले के टुकड़े पड़ने से आंखों में होने वाली रड़क का इलाज करते करते मां भी थक जाती होंगी ....कभी पानी से बार बार धोने को कहतीं ...कभी दुपट्टे को बार बार फूंक मार कर हमारी लाल हुई थोड़ी सूज रही आंख पर रख देती - इस तरह की सिंकाई से हम पांच मिनट में ठीक हो जाते ...लेकिन फिर वही ज़िद बाहर देखने की ....फिर वही मां के आंचल से राहत मिल जाती ....
जाने कहां गये वो दिन .........!! अच्छा, अगर हो सके तो जाते जाते यह सुंदर गीत ज़रूर सुनिएगा.... यह रहा इस का लिंक ... (इस पर क्लिक करिए)





बचपन की यादें आज कहानी का मज़ा देती है.. कितने सुहाने थे वो दिन🎉🤔🙏
ReplyDeleteसच में सलूजा जी आपने तो मेरे दिल की बात कह दी...शुक्रिया..
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