Thursday, April 8, 2021

एक दरख़्त जिससे दोस्ती तीस साल पुरानी है ...

ज़िंदगी के शुरूआती 28-29 बरस पंजाब में रहे ... फूल अच्छे लगते थे ...घर में उगते भी बहुत थे ...लेकिन पेड़ों के बारे में सोचने की शायद उस उम्र में फ़ुर्सत ही न थी ... मैंने घर में या आसपास के लोगों में पेड़ों के प्रति लगाव बस उस के फल खाने या उस की छांव का आनंद लेने तक ही देखा... मुझे अच्छे से याद है कि जैसे लोग ठंडी के मौसम का इंतज़ार करते रहते ....जैसे ही ठंडी पड़नी शुरू होती ... कश्मीर से हातो कॉलोनी में कुल्हाड़ी लेकर घूमते दिख जाते .. वे पेड़ काटने का काम करते थे। 

हमारे घर के बाशिंदों को लगता था कि घर के मेनगेट पर जो नीम का पेड़ है ..उस की वजह से धूप आंगन तक पहुंच नहीं पाएगी...इसलिए हर साल उसे कटवाना (वे इसे छंगवाना कहते थे- छंटाई करवाना) ज़रूरी होता था ...मुझे अच्छे से याद है वह हातो आठ-दस रूपये लेकर उस दरख़्त को छांग देता था....अच्छा, हम बच्चे थे, हमें इतनी कहां समझ थी....हम तो बस दोस्तों के साथ दूर बैठ कर उस हातो को फ़ुर्ती से उछल कर पेड़ पर चढ़ कर कुल्हाड़ी से दरख्त की बड़ी बड़ी शाखाएं काट काट नीचे फैंकते देख कर हैरान से हुए चुपचाप बैठे रहते ...उस दौर में हमें दरख़्तों से कुछ मतलब ही न था...छाया रहे, न रहे ...क्या फ़र्क पड़ता है ..। 

अच्छा, जिस दरख़्त की बड़ी बड़ी शाखाएं वह नीचे फैंकता, फिर नीचे आकर उस के छोटे टुकड़े भी करता ...चूल्हे में जलाने लायक ...। यह वह दौर था जब यह कुकिंग गैस नहीं आई थी ...लेकिन गैस के आने के बाद भी यह पेड़ की कांट-छांट के नाम पर पेड़ को ठंड़ी शुरू होते ही हर साल गंजा कर देने का सिलसिला चलता ही रहा...

यह बीमारी हमारे घर में ही न थी ...मुझे लगता है यह महामारी पूरी कॉलोनी में ही मौजूद थी ... क्योंकि एक बार हातो आता तो कईं पेड़ों पर कुल्हाड़ी चला कर ही जाता....

ऐसे माहौल में हमारा बचपन बीता ...ऐसे में जब कभी किसी बाग जैसी जगह जैसे अमृतसर के कंपनी बाग जाने का मौक़ा मिलता तो वहां बड़े बड़े पेड़ देख कर अच्छा लगता....उन दिनों अमृतसर की गुरूनानक देव यूनिवर्सिटी की इमारत भी नई बन ही रही थी ..वहां भी खूब पेड़ लग रहे थे ...वहां जब जाते थे तो अच्छा लगता था .. 

25-26 साल की उम्र में दिल्ली जाते या कभी चंडीगढ़ जाना होता तो वहां भी बड़े बड़े दरख़्त देख कर बहुत अच्छा लगता...इस के आगे कुछ नहीं...

लेकिन मैं इस वक्त एक ऐसे दरख़्त का किस्सा आपको सुनाना चाहता हूं जिससे मेरी दोस्ती 30 साल पुरानी है ...हैरानी है कि वह अभी भी टिका हुआ है ..लेकिन महानगरों में कानून-कायदे कड़क हैं, इसलिए पेड़ों को हाथ लगाना इतना आसान नहीं है। 

हां तो बात है यह 1991 की ...हम लोग बंबई में आए ही थे ...यह जो दरख्त आप इस तस्वीर में देख रहे हैं यह बंबई सेंट्रल के पास मराठा मंदिर सिनेमा से पैदल दो मिनट की दूरी पर है ...जिस कम्पलेक्स में हम रहते थे उस की बाउंड्री पर यह दरख़्त था ... उस के पास ही एक और भी क़दीमी दरख़्त था ...इन बड़े दरख़्तों को इतने पास से मैंने शायद पहली बार उन दिनों ही देखा होगा ...शायद देखा तो होगा पहले भी कहीं लेकिन हमें उस उम्र में इन सब फ़िज़ूल से लगने वाले "क़ुदरती नज़ारों" की फ़िक्र ही कहां होती है ...हम तो एक अच्छी सी नौकरी हथिया लेने के चक्कर में पड़े रहते हैं....

बहरहाल, यह जो दरख़्त है मुझे इसे आते जाते इसे देखना बहुत पसंद था ... यह जो गेट आप देख रहे हैं, यह गेट भी खुला रहता था....इस से बाहर निकलते ही दाईं तरफ़ बंबई सेंट्रल का बस डिपो है और आगे अग्रीपाड़ा शुरू हो जाता है ....

तीस साल पुराना दोस्त 

जब भी बंबई सेंट्रल की तरफ़ जाना होता रहा पिछले 30 साल में इस को देखने से पता नहीं अंदर से एक ख़ुशी का अहसास तो होता ही है ... दो दिन पहले भी उस तरफ़ जाना हुआ...मैंने बेटे को कहा कि ज़रा रूकना होगा ...मुझे मेरे 30 साल पुराने दोस्त के साथ तस्वीर खिंचवानी है ...वह ख़ुशी ख़ुशी रुक गया और मेरी तस्वीरें खींच दी ... वैसे भी मेरे पास मेरी खींची हुई पेड़ों की हज़ारों तस्वीरें हैं ...क्योंकि मैं जहां भी जाता हूं, मेरी नज़रें वहां के दरख्तों पर ही टिकी रहती हैं....मुझे और किसी चीज़ से कुछ मतलब नहीं होता...


एक बार जब 30 साल पहले मेरी इस क़दीमी दरख़्त के साथ दोस्ती हो गई तो उस के बाद मैं कहीं भी गया ...बंगलौर में, चैन्नई में या  यूएसए में ... कहीं भी ..पुराने पुराने पेड़ ही मुझे अपनी तरफ़ खींचते ..दो चार दिन दुबई रहने का मौका मिला ...लोग वहां की इमारतें देखने को तरसते ...मैं वापिस लौटने के दिन गिनता ...मुझे पुराने दरख़्तों के बिना वह शहर इतना कंगाल दिखा कि मैंने कहा कि अगर कभी मुझे कोई मुफ्त की टिकट देकर भी दुबई भेजे तो भी मैं न आऊं यहां...सच में मुझे वहां ज़रा भी अच्छा नहीं लगा..सारे का सारा कंक्रीट का जंगल ...शुक्र किया कि तीन चार दिन बीते और लौट के बुद्धु घर को आए....

अब घर में भी जितने दरख़्त हैं उन पर कुल्हाड़ी चलाना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा लगता है ...कईं कईं महीने हो जाते हैं घर गए हुए ...लेकिन जब जाते हैं तो वही पुराने बेतरतीब से उग रहे पेड़ देख कर भी सुकून ही मिलता है ... 

महीनों बाद घर जाते हैं तो दरख़्त इंतज़ार करते मिलते हैं...

एक काम करेंगे? ...जाते जाते यह गीत सुनते जाइए ... मधुबन खुशबू देता है ...सागर सावन देता है ... (इस लिंक पर क्लिक करिए)

 

3 comments:

  1. वाकई सही कहा आपने, पेड़ हमारे सच्चे साथी, जो काटे इन्हें वो अपराधी। नेचर के करीब जाना वाकई सकून देता है सही मायनों में दोस्त ही तो है ये हमारे

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    1. जी हां, बिल्कुल, पेड़ हैं तो हम हैं....कहीं भी जाते हैं पेड़ देखते ही माहौल इतना खुशनुमा हो जाता है कि क्या कहें, सच में बांछें खिल जाती हैं..

      मैं सोचा करता था कि मैं तो वनस्पति शास्त्र (Botany) ही पढूंगा ...उसमें पीएचडी करके डाक्टर बनूंगा ...इतने में बीडीएस की कॉल आ गई ...मरता क्या न करता!

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  2. गठरी खुली रखो...यादों को हवा लगने दो...खुश रहो,खुशियां सांझी करते रहो😘👍🙏

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