Monday, April 5, 2021

अच्छा तो ज्यूली 'एडल्ट' मूवी थी !

आज सुबह मुझे लगभग ५० साल पुराना एक फिल्मी गीत याद आ गया ...मैंने उसे यू-ट्यूब पर सुना ...मुझे अच्छा लगा...उस फ़िल्म का ख्‍याल आ गया ...जनाब आनंद बख़्शी ने वह गीत लिखा था...


मैंने उसे अपनी डॉयरी में लिख कर शेयर किया तो बहुत से कमैंट दिखे ..एक साहब ने लिखा था कि ज्यूली फिल्म वैसे तो एडल्ट मूवी थी लेकिन इस के गानों का जादू सभी लोगों के दिलो-दिमाग़ पर छाया हुआ था...

मुझे ख़्याल नहीं था कि यह एक एडल्ट फिल्म थी ..क्योंकि मैंने तो इसे टीवी पर ही देखा था ...लेकिन अब लिखते हुए लग रहा है कि टीवी पर भले ही देखा होगा लेकिन दूरदर्शन पर नहीं देखा होगा ...तभी देखा होगा जब ये केबल टीवी की आंधी चलने लगी होगी ...क्योंकि ये तो एडल्ट फिल्में भी दिखाने लगे थे लेकिन दूरदर्शन एडल्ट फिल्में - ए सर्टिफिकेट वाली फिल्में प्रसारित नहीं करता था...

मुझे भी फिल्म बहुत ही पसंद आई थी और इस के गीतों की तो बात ही क्या करें...एक से बढ़ कर एक ... लिरिक्स भी कमाल के, गायकों और संगीतकारों का जादू भी था और ऊपर से इन का इतना उम्दा फिल्मांकन...ऐसे गीत ही लोगों के दिलो-दिमाग़ पर छाए रहते हैं। 

एडल्ट फिल्मों से याद आया कि पिक्चर हाल में भी जब फिल्म लगती थी तो वहां भी बड़ा बड़ा लिख कर टंगा होता था कि यह फिल्म १८ साल से कम उम्र के लोगों के लिए नहीं है। आज १९७५ के आसपास की बात होगी ...मैं १२-१३ बरस का रहा हूंगा...दिल्ली में मेरे पिता जी, ताऊ जी, चाचा जी, बड़ी बुआ का बेटा (जो लगभग मेरे चाचा की उम्र का ही था), उन का बेटा जो मेरी उम्र का था और मैं ...हम सब लोग एक थियेटर में गए...लेकिन वहां जाकर पता चला कि वहां पर तो एडल्ट फिल्म लगी हुई है ...मुझे याद है उन सब की वह फिल्म देखने की बड़ी हसरत थी ...(मुझे याद नहीं कौन सी फिल्म थी) ...लेकिन ये जो १२-१३ साल के दो नग उनके साथ थे उन की वजह से उन्हें टिकटें नहीं मिली... उन्होंने पता नहीं हमारे बारे में क्या होगा या न कहा होगा....लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिली और फिल्म देखे ब़गैर सब लौट आए.. उन्होंने कहा होगा कि ये तो छोटे बच्चे हैं ...जहां तक मुझे ख्याल है मैंने भी धीेरे से कुछ कहा तो था कि हमारा क्या है, हम तो आंखें बंद किए रहेंगे। लेकिन एक बालक की बेवकूफ़ाना दलील कौन सुनता!

अच्छा, अभी याद आ रहा है कि लोगों को पता कैसे चलता था कि फलां फलां फिल्म एडल्ट फिल्म है ....एक तो बड़े बड़े चौराहों पर लगे हुए पोस्टर पर यह लिखा रहता था ..लिखा क्या रहता था, बड़े से 'A' का ठप्पा लगा रहता था ...उस के आसपास एक सर्कल खींचा हुआ होता था ... और थियेटर से भी पता चल ही जाता था....और अख़बार में छपने वाले फिल्मों के इश्तिहार से भी पता चल जाता था कि कौन सी फिल्म यू-सर्टिफिकेट है और कौन सी ए-सर्टिफिकेट ....

दूरदर्शन में भी जहां तक मुझे ख़्याल है ए-सर्टिफिकेट फिल्में नहीं दिखाते थे ...और सामान्य फिल्मों में भी अगर कुछ आपत्तिजनक दृश्य होते थे तो उन्हें काट कर ही दिखाया जाता था...और इस के बावजूद हर घर में एक सेंसरशिप और भी हुआ करती थी ....कभी भी कोई आपत्तिजनक दृश्य आने की जैसे ही संभावना दिखती ..किसी को चूल्हे पर चढ़ी हुई दाल देखना याद आ जाता, किसी को बीड़ी-सिगरेट या माचिस की डिब्बी ढूंढना या किसी को वॉश-रूम जाने का या बाहर जा कर पानी पीने का विचार आ जाता...

अच्छा, अभी याद आ रहा है कि लोगों को पता कैसे चलता था कि फलां फलां फिल्म एडल्ट फिल्म है ....एक तो बड़े बड़े चौराहों पर लगे हुए पोस्टर पर यह लिखा रहता था ..लिखा क्या रहता था, बड़े से 'A' का ठप्पा लगा रहता था ...उस के आसपास एक सर्कल खींचा हुआ होता था ... और थियेटर से भी पता चल ही जाता था....और अख़बार में छपने वाले फिल्मों के इश्तिहार से भी पता चल जाता था कि कौन सी फिल्म यू-सर्टिफिकेट है और कौन सी ए-सर्टिफिकेट ....

दूरदर्शन में भी जहां तक मुझे ख़्याल है ए-सर्टिफिकेट फिल्में नहीं दिखाते थे ...और सामान्य फिल्मों में भी अगर कुछ आपत्तिजनक दृश्य होते थे तो उन्हें काट कर ही दिखाया जाता था...और इस के बावजूद हर घर में एक सेंसरशिप और भी हुआ करती थी ....कभी भी कोई आपत्तिजनक दृश्य आने की जैसे ही संभावना दिखती ..किसी को चूल्हे पर चढ़ी हुई दाल देखना याद आ जाता, किसी को बीड़ी-सिगरेट या माचिस की डिब्बी ढूंढना या किसी को वॉश-रूम जाने का या बाहर जा कर पानी पीने का विचार आ जाता...

1990 के आसपास जब केबल टीवी- सेटेलाइट टीवी आ गया ..तो धीरे धीरे लोगों में सभी तरह के प्रोग्राम एक साथ बैठ कर देखने की स्वीकार्यता बढ़ने लगी ...इन प्रोग्रामों को सारा कुनबा एक साथ बैठ कर देखने भी लगा और बीच बीच में कुछ किरदारों को, उन की वेश-भूषा, उन की बोल-वाणी को कोसने तो लगते.....लेकिन अब उस बैठक से कोई भी उठने को तैयार न होता..

इसके बाद क्या हुआ...लिखते लिखते याद आ गया ....मैं उन दिनों मॉस-कम्यूनिकेशन पढ़ रहा था ...एक प्रोफैसर ने एक दिन क्लास में हमें कहा कि जब से टीवी बैठक से निकल कर घर के सभी सदस्यों के कमरों में पहुंच गये ....बस, उस दिन से मामला बिल्कुल कंट्रोल के बाहर हो गया.......आज हम देख रहे हैं कि वेब-सीरीज़ में और रिएटली-शो में क्या क्या परोसा जा रहा है ...लेकिन बात वही है मीडिया कंवर्जैंस का दौर कब का आ चुका है ...आज हम टीवी स्क्रीन के मोहताज थोड़े ही न रहे हैं ....सब कुछ सिमट कर हमारी हथेली में आ चुका है ...जो कुछ भी देखना है वह हमारी अंगुली से तय हो जाता है, कोई बाहरी कंट्रोल नहीं, घर में किसी की रोका-टोकी नहीं, कोई सैंसर नहीं, किसी को बहाना बना कर उठ कर बाहर जाने की ज़रूरत नहीं ....किसी तरह के पर्दे की ज़रूरत नहीं ....

यह कहां आ गये हम ....!!

4 comments:

  1. हमेशा दिल खोलकर लिखते हो आप डॉक्टर साहब। आपकी बारीक ऑब्जर्वेशन भी कमाल की है, एक एक शब्द अतीत की यादों में ले गया। आपके लेखन में कोई मिलावट बनावट नही है। दिल की बात कलम से पूरी उतार देते है आप। लिखते रहे यूं ही

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    1. आपने दिल खोल कर लिखा जिसके लिए शुक्रिया...
      ऐसी ही टिप्पणी होती है जो हमें अगली पोस्ट में और भी खुल कर लिखने के लिए प्रेरित करती है ...सच में ...यह महज़ लिखने के लिए नहीं लिख रहा हूं ..ऐसा ही होता है ...कभी कभी इस तरह की टिप्पणी मिलती है तो लिखने वाला अपने आप से कहता है ...लिख यार, बिंदास लिख...परवाह न कर...क़लम की ईज़्जत रख ले..
      बहुत बहुत शुक्रिया आप का ...

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  2. न जाने किस जहां में खो गए हम...🙏🙏

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    1. सच्ची, सलूजा साहब, आपने सही फरमाया ...अतीत में गोते लगाने से हम यूं ही खो जाते हैं..शुक्रिया ...

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